ननिहाल

हमारा भी होता था एक ननिहाल
जहाँ हम जाया करते थे हर साल
मामा,,मौसी के प्यार की दिया करते थे मिसाल
वो मामा,मौसी का प्यार
वो नानी का दुलार
वो खुशी का महौल, जैसे हो कोई त्योहार
वो भाई, बहनों के साथ खेलना, राजा, मंत्री, चोर,सिपाही
वो खाना सीता राम हलवाई की अमरसे की मिठाई
सोना बरामदे में बिछा कर चारपाई
वो खाना इकट्ठे बैठ कर मूंगफली
साथ में रखना गुड़ की डली
फिर हो गया मामा, मौसी में जायदाद का बंटवारा
चला गया ननिहाल भी साथ हमारा
अब मामा, मौसी नहीं रहते साथ
बस शादी या मौत पर ही होती है मुलाकात
अब सब कहते हैं हमारी ऊँची हो गई है औकात
हमारे बच्चे विदेशों में बसते हैं
अब सब बनावटी हँसी हँसते हैं
फेसबुक और सकाईप पर ही मना लेते हैं, होली दिवाली
घर हो गए बड़े, कमरे हो गए खाली
कोठी है कार है
मगर सब बेकार है
रिश्ते नाते गए छूट
अपने गए रूठ
दिल गए टूट
बच्चे बैठे इतनी दूर
माँ बाप यहां मजबूर
लेकिन कम नहीं हो रहा गुरूर
यह नहीं कि फोन उठाए
फिर से बहन भाई को मिलाये
या उनके चले जाए, या उनको अपने यहां बुलाए
आओ छोड़ कर गुरूर, कुछ ऐसा करे कमाल
आओ फिर से बनाएं वही ननिहाल
इकट्ठे बैठे बीत गए कई साल
आओ फिर से मिल कर मूंगफली खाएं
आओ वो पहले वाला ननिहाल बनाएं

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About ajaykohli

Consultant ,deals in life management, psychology, astrology ,vaastu , fitness ,diet ,relationship counseling

Posted on December 20, 2016, in india, poetry, relationship. Bookmark the permalink. 2 Comments.

  1. बहुत सुंदर। Excellent and very very true!! I miss those days too..

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